Noor-e-Inquilab Logo
An emotional, dark shot of the Jallianwala Bagh memorial.

जलियांवाला बाग, अमृतसर — Jallianwala Bagh

13 अप्रैल 1919 के शहीदों को समर्पित — A tribute to the martyrs of 1919

Visitor Information
Open

Timings

गर्मियों में: 6:30 AM – 7:30 PM | सर्दियों में: 7:00 AM – 6:00 PM (साप्ताहिक अवकाश नहीं)

Entry Fee

बिल्कुल मुफ्त (Free for all)

Light & Sound Show

शाम को 45 मिनट का शो — टिकट ₹50–₹200

Collective Interest

343k+

Views

120k+

Online Searches

A Turning Point in History — एक मोड़ जिसने भारत बदल दिया

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से सिर्फ 200 मीटर की दूरी पर बसा जलियांवाला बाग भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा प्रतीक है जिसकी मिट्टी आज भी 1919 की त्रासदी की कहानी कहती है। यह 6.5 एकड़ का सार्वजनिक उद्यान आज एक राष्ट्रीय स्मारक है, जहां हर साल लाखों लोग आते हैं उन शहीदों को श्रद्धांजलि देने जिनका बलिदान भारतीय आज़ादी की आधारशिला बना।

13 अप्रैल 1919 — वो दिन जिसने इतिहास बदल दिया

वह बैसाखी का दिन था। पूरे पंजाब में फसल कटाई और नए साल का उत्सव था। दोपहर के समय हजारों लोग — मर्द, औरतें, बच्चे, बुज़ुर्ग — जलियांवाला बाग में इकट्ठे हुए थे। कुछ लोग बैसाखी मनाने आए थे, कुछ रोलेट एक्ट के विरोध में आयोजित शांतिपूर्ण सभा में भाग लेने।

शाम लगभग 5:30 बजे, ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर 90 सैनिकों — मुख्यतः गोरखा और बलूच राइफलमेन — और दो बख्तरबंद कारों के साथ बाग में पहुंचे। बाग में आने-जाने का सिर्फ एक संकरा रास्ता था। डायर ने उसी रास्ते को सेना से ब्लॉक करवा दिया, और बिना किसी चेतावनी के गोली चलाने का आदेश दे दिया।

अगले 10 मिनट तक बाग में सिर्फ गोलियों की गूंज थी। कुल 1,650 राउंड फायर किए गए। चारों तरफ ऊंची दीवारें थीं — लोग भागने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कोई रास्ता नहीं था। सैकड़ों लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए बाग में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी — आज वही कुआं शहीदी कुआं कहलाता है। आधिकारिक ब्रिटिश रिकॉर्ड्स ने 379 मौतें दर्ज कीं, लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य इतिहासकारों के अनुसार वास्तविक संख्या 1000 से अधिक थी।

जनरल डायर और रोलेट एक्ट का काला अध्याय

1919 में अंग्रेज़ी सरकार ने रोलेट एक्ट पारित किया था — एक ऐसा कानून जो किसी भी भारतीय को बिना मुकदमे के, बिना सबूत के, सिर्फ शक के आधार पर जेल में बंद रख सकता था। महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, और अन्य नेताओं ने इसके खिलाफ देशव्यापी सत्याग्रह की पुकार दी थी।

अमृतसर में 10 अप्रैल को दो प्रमुख नेताओं — डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू — को अंग्रेज़ी सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। इसके विरोध में लोग सड़कों पर उतरे। पुलिस की गोली से कई लोग मारे गए, और गुस्साई भीड़ ने सरकारी इमारतों में आग लगा दी। डायर को अमृतसर भेजा गया, और उसने 12 अप्रैल को सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया — लेकिन बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी थी।

बाद में हंटर कमीशन की जांच में डायर ने स्वीकार किया कि अगर उसके पास और बड़ी मशीनगन होती तो वो और भी ज़्यादा लोगों पर गोली चलवाता। ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स ने उसकी निंदा की, लेकिन ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने उसका समर्थन किया। डायर को इंग्लैंड में हीरो की तरह स्वागत मिला — उसके लिए 26,000 पाउंड (आज के 16 लाख रुपये) इकट्ठा किए गए।

परिणाम और आज़ादी की लौ

जलियांवाला बाग की त्रासदी ने भारत की राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ी सरकार से अपने सम्मान वापस कर दिए। रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी नाइटहुड उपाधि (Knighthood) त्याग दी — यह कहते हुए कि वो अब उन हाथों से मिले सम्मान को पहन नहीं सकते जिन्होंने इतना खून बहाया।

सबसे बड़ा बदलाव आया उधम सिंह के रूप में। 21 साल के उधम ने उसी दिन कसम खाई थी कि वो डायर से बदला लेंगे। 21 साल बाद, 13 मार्च 1940 को लंदन में, उन्होंने पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ'डायर — जिसने डायर के आदेश को मंज़ूरी दी थी — को गोली मार दी। उधम सिंह का आख़िरी कथन था: "मैंने उसे मार दिया क्योंकि मेरे लोगों को कुचलने का उसका हिस्सा था। मुझे मरने में कोई डर नहीं — मैंने अपना कर्तव्य निभाया।" विस्तृत कहानी के लिए पढ़ें: जलियांवाला बाग हत्याकांड: 13 अप्रैल 1919 की पूरी कहानी, जनरल डायर से उधम सिंह तक

आज का स्मारक — क्या-क्या देखें

1961 में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जलियांवाला बाग स्मारक का उद्घाटन किया। 2021 में स्मारक का पूर्ण नवीनीकरण किया गया, और एक नया शताब्दी स्मृति संग्रहालय भी बनाया गया।

  • Flame of Liberty (आज़ादी की लौ): लाल पत्थर का यह 30 फुट ऊंचा स्तंभ बाग के बीचों बीच खड़ा है, शहीदों की जलती लौ का प्रतीक।
  • शहीदी कुआं (Martyrs' Well): वो ऐतिहासिक कुआं जिसमें 120 लोगों ने जान बचाने के लिए छलांग लगाई थी। आज यह कांच से ढका हुआ है।
  • गोलियों के निशान वाली दीवारें: आज भी 28 बुलेट होल्स साफ दिखाई देते हैं — सरकार ने इन्हें संरक्षित किया है।
  • शताब्दी संग्रहालय: 4 गैलरीज़ — ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, घटना का दिन, स्वतंत्रता संग्राम पर असर, और वर्तमान विरासत।
  • Memorial Garden: 6.5 एकड़ का खूबसूरत बगीचा जहां पाम के पेड़, फूलों की क्यारियां, और शांत वातावरण है।

2026 में जब आप यहां आएं, तो शहीदी कुएं के पास रुकें, गोलियों के निशानों को देखें, और एक पल के लिए कल्पना करें कि वो दिन कैसा रहा होगा। यह अनुभव आपको हर ऐतिहासिक किताब से ज़्यादा कुछ सिखाएगा।

कैसे पहुंचें — How to Reach

जलियांवाला बाग अमृतसर शहर के बीचों बीच Hall Bazaar में स्थित है। श्री गुरु राम दास जी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (ATQ) से 13 किलोमीटर दूर है — टैक्सी से 30 मिनट। अमृतसर जंक्शन रेलवे स्टेशन से सिर्फ 2 किलोमीटर — ऑटो रिक्शा से 5–10 मिनट। IRCTC पर दिल्ली से शताब्दी एक्सप्रेस (6 घंटे) और मुंबई से Golden Temple Mail (32 घंटे) उपलब्ध हैं।

स्वर्ण मंदिर (SGPC द्वारा संचालित) से सिर्फ 200 मीटर की पैदल दूरी है। दोनों एक साथ देख सकते हैं — पूरी प्लानिंग के लिए हमारा यह गाइड पढ़ें: अमृतसर में घूमने की 10 बेस्ट जगहें 2026

क्यों हर भारतीय को यहां आना चाहिए

जलियांवाला बाग सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं है — यह उन शहीदों का तीर्थ है जिन्होंने हमारी आज़ादी की नींव अपने खून से सींची। यहां आना मतलब उन्हें सम्मान देना। एक बार जब आप उन गोलियों के निशानों के सामने खड़े होते हैं, तो "आज़ादी" शब्द का असली अर्थ समझ में आता है। 2019 में इस घटना के 100 साल पूरे हुए — और आज भी यह विरासत हर भारतीय को याद दिलाती है कि हमारी आज़ादी मुफ्त में नहीं मिली।

विस्तृत visiting guide और 2026 की updated जानकारी के लिए: जलियांवाला बाग खुलने का समय, एंट्री फीस और लाइट शो टिकट 2026। हमारे सभी ऐतिहासिक लेख भी ज़रूर पढ़ें।

Visitor Reviews

4.6(based on 12,483 reviews)
5 star
68%
4 star
23%
3 star
5%
2 star
3%
1 star
2%
S

Santhosh Bhadran

The place is well maintained and there's no entry fee. You can easily spend a couple of hours exploring around and understanding the history connected to this site. As you walk through, you'll come across many untold stories. some displayed, some narrated by locals or guides. A must-visit place in Amritsar to truly feel a part of India's past.

G

Gagan deep singh

Jallianwala Bagh is a powerful and emotional historic place that reminds us of the tragic 1919 massacre. The bullet marks and the Shaheed Well clearly show the pain and sacrifice of innocent people. The small museum inside provides simple and useful information about what happened that day. The atmosphere is peaceful, yet filled with deep emotions. Overall, it is a must-visit place to understand India's freedom struggle and pay respect to the martyrs.

G

Guru Saran

Visiting Jallianwala Bagh was a deeply emotional experience. The moment I entered, I could feel the weight of history in the air. The bullet marks on the walls and the Martyrs' Well speak volumes about the pain and courage of those who stood here a century ago.The place is beautifully maintained and filled with stories that remind us what freedom truly cost. The eternal flame and memorial create a peaceful yet powerful atmosphere that leaves you silent and reflective.It's not just a tourist spot — it's a reminder of bravery, sacrifice, and the resilience of our nation. Every Indian should visit at least once.

View More Reviews on Google

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Frequently Asked Questions about Jallianwala Bagh

जलियांवाला बाग का खुलने का समय क्या है?+
जलियांवाला बाग गर्मियों (अप्रैल–सितंबर) में सुबह 6:30 बजे से शाम 7:30 बजे तक, और सर्दियों (अक्टूबर–मार्च) में सुबह 7:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक खुला रहता है। साप्ताहिक अवकाश नहीं होता — सोमवार से रविवार तक हर दिन खुला रहता है।
क्या जलियांवाला बाग में प्रवेश शुल्क है?+
नहीं, जलियांवाला बाग में प्रवेश पूरी तरह निःशुल्क है। चाहे आप भारतीय नागरिक हों या विदेशी पर्यटक, बच्चे हों या वरिष्ठ नागरिक — किसी से भी कोई शुल्क नहीं लिया जाता। केवल लाइट एंड साउंड शो और शताब्दी स्मृति संग्रहालय के लिए अलग टिकट लेना होता है।
जलियांवाला बाग में लाइट एंड साउंड शो की टिकट कितने की है?+
लाइट एंड साउंड शो की टिकट भारतीयों के लिए ₹50–₹100, बच्चों के लिए ₹25–₹50, और विदेशी पर्यटकों के लिए लगभग ₹200। टिकट परिसर के अंदर ही उसी दिन काउंटर से मिलते हैं — पहले आओ पहले पाओ के आधार पर। शो शाम को 45 मिनट का होता है।
13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में क्या हुआ था?+
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने अपनी सेना के साथ निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियां चलवाईं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 379 लोग शहीद हुए और 1100+ घायल हुए, लेकिन कई इतिहासकार मानते हैं कि असली संख्या 1000 के पार थी। सैनिकों ने लगभग 1650 राउंड फायर किए। इस घटना ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी।
जलियांवाला बाग और स्वर्ण मंदिर एक साथ देख सकते हैं?+
बिल्कुल। जलियांवाला बाग और स्वर्ण मंदिर के बीच सिर्फ 200 मीटर की पैदल दूरी है। ज़्यादातर पर्यटक सुबह स्वर्ण मंदिर जाते हैं, लंगर खाते हैं, और फिर दोपहर में जलियांवाला बाग। दोनों जगहें Hall Bazaar के पास हैं।
जलियांवाला बाग कैसे पहुंचें?+
अमृतसर जंक्शन रेलवे स्टेशन से जलियांवाला बाग सिर्फ 2 किलोमीटर दूर है — ऑटो रिक्शा या ई-रिक्शा से 5–10 मिनट में पहुंच जाएंगे। श्री गुरु राम दास जी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (ATQ) से 13 किलोमीटर है, टैक्सी से 30 मिनट। दिल्ली से सड़क मार्ग से 450 किमी (NH-44 के ज़रिए 7–8 घंटे)।
क्या जलियांवाला बाग में फोटोग्राफी की अनुमति है?+
हां, मुख्य बाग और स्मारक स्तंभ की फोटोग्राफी की अनुमति है। हालांकि शहीदी कुएं और शताब्दी संग्रहालय के अंदर फोटो/वीडियो लेना मना है। यह एक स्मारक स्थल है, इसलिए सम्मानजनक तरीके से ही फोटो लें — सेल्फी और पोज़ करते समय गंभीरता बनाए रखें।
शहीदी कुआं क्या है?+
शहीदी कुआं (Martyrs' Well) वो ऐतिहासिक कुआं है जिसमें 13 अप्रैल 1919 को सैकड़ों लोगों ने गोलियों से बचने के लिए छलांग लगाई थी। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार इस कुएं से 120 शव निकाले गए थे। आज यह कुआं कांच से ढका हुआ है ताकि आप उसमें झांक कर श्रद्धांजलि दे सकें।

Related Articles